पहले एक आउटलेट था, अब हैं नौ आउटलेट के मालिक

अपने कर्मचारियों को अपना परिवार समझना, उनको हरेक सुविधाएं देना और सभी के साथ मृदु भाषा में बातचीत। यह है सिंधी स्वीट्स के मालिक नीरज बजाज और उनके परिवार की सफलता का राज। इसी की बदौलत वर्ष १९७६ में चंडीगढ़ सेक्टर-१७ से शुरू हुआ कारवां अब पहुंच गया है पंजाब, हरियाणा और देश विदेश तक।
सेक्टर-१७ में खुला था पहला शो रूम
नीरज बजाज ने बताया कि उन्होंने अौर उनके पिता सीएल बजाज ने सेक्टर-१७ में सिंधी स्वीट्स की नींव रखी थी। उस समय यहां कम दुकाने थीं, चंडीगढ़ का कल्चर एकदम अलग था। उसका लाभ यह होता था कि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल के लोग भी चंडीगढ़ से ही मिठाई खरीदने आते थे। नीरज बजाज ने बताया कि सिंधी स्वीट्स में हमेशा देसी घी का प्रयोग ही होता था औ अभी भी एेसा ही है। इसकी प्रसिद्ध से ही लोग यहां खिंचे चले आते थे।
एक रुपये की तीन देसी घी की पूड़ी
सिंधी स्वीट्स के मालिक नीरज बजाज ने बताया कि उन्होंने शुरुआत में एक रुपये की तीन देसी की पू़ड़ियां बेचनी शुरू की थीं। उस समय १८ रुपये किलो काजू मिलता था। महंगाई थी ही नहीं, दुकान भी बनवाई तो करीब अस्सी हजार रुपये में सारा कुछ हो गया था। अब एेसा नहीं रह गया है। उन्होंने बताया कि इसी तरह अन्य आइटम के दाम होते थे। चंडीगढ़ सेक्टर-१७ में ही नीलम थिएटर के पास उस समय एक दुकान खोली थी जिसमें साढ़े पांच रुपये की थाली बेचा करते थे।
दूसरा आउटलेट खोला १९७८ में
चंडीगढ़ में मैने अपना दूसरा आउटलेट १९७८ में खोला था। कुछ समस्या हो गई तो उसको बंद करना पड़ा। एक आउटलेट १९८३ में खोला और उसके बाद सेक्टर-८ में एक आउटलेट खोला। वास्तव में किसी भी व्यापार की सफलता की कहानी परिवार के सदस्यों और कर्मचारियों के सहयोग के बगैर नहीं लिखी जा सकती है। इसीलिए कर्मचारियों को हमने हमेशा अपने सिंधी परिवार की तरह समझा और उनको हरके सुविधा देते हैं।
अब एडवांसमेंट पर है हमारा ध्यान
चंडीगढ़ में हमने जब अपने आउलटेट की शुरुआत की थी तो उस समय खुद आउटलेट को डिजाइन किया था। अब मैने ढंग चेंज कर दिया है। अब आर्किटेक्ट की मदद लेते हैं। उसकी वजह है कि हम चाहते हैं कि मार्डन सुविधाओं का उपयोग किया जाए। यही कारण है कि हमारे सारे आउटलेट एक ढंग के ही हैं।

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