आतंक से अपनों को बचाया, बिजनेस को बढ़ाया

दो पेट्रोल पंप और सात एजेंसी। हम खुशहाल थे, हमारा परिवार खुशहाल था। घर में दो बेटे और हम दो। पंजाब में आतंक का दौर छाया तो मानो हमारे ऊपर आफत ही आ गई। मैं केएनवी डीएवी कालेज में लेक्चरार थी। जिस समय आतंकवाद शुरु हुआ उस वक्त अमन और अवि छोटे थे। हम आतंकवादियों की लिस्ट में थे। यह है आतंकवाद के दौर में गोलियों से बचकर अपने परिवार को दोबारा एक मुकाम तक पहुंचाने वाली इंटरप्रेन्योर और शिक्षाविद किरन भसीन का। किरन भसीन बताती हैं कि रोजाना धमकियां मिलती थीं। पंद्रह दिन में शहर को छोड़ दें। हमको फोन आते थे। एक दिन मेरे पति सुनील भसीन ने कहा कि मैं जालंधर चला जाता हूं कोई दूसरी यूनिट देख लेता हूं। वह अवि को लेकर चले गए। मैं जंडियाला में अपने छोटे बेटे के साथ रही। कभी अवि से मिलने का मन करता तो मैं जंडियाला से जालंधर तक करीब दो सौ किलोमीटर तक सफर करके चली आती। मैं स्कूटर के आते वक्त पगड़ी बांध लेती थी और मुह को ढंक लेती थी। लेकिन वक्त को यह मंजूर नहीं था। जंडियाला में फ्लड आ गया। मैंने तंग आकर जंडियाला छोड़ दिया। मैने और मेरे पति ने जंडियाला छोड़ दिया वर्ष १९८८ में हम चंडीगढ़ आ गए। हमने यहां अपनी फैक्ट्री खोली और काम शुरू किया। बेटे बड़े हुए तो उन्होंने इस काम को आगे बढ़ाया। हमने यहां साक कंपनी खोली जो कि अब पंजाब में कार माडिफिकेशन में एक बड़ा नाम है।अब अवि फैक्ट्री संभालते हैं और भारतीय जनता पार्टी के स्टेट कन्वीनर भी हैँ। वहीं दूसरी ओर अमन भसीन कार माडिफिकेशन में एक बड़ा मुकाम हासिल कर चुके हैं। किरन भसीन ने कहा कि उनका पंचकूला में एक हाईस्कूल है जिसे वह संभालती हैं।
अब सेकेंड डीसी के नाम से हैं मशहूर
अवि भसीन ने बताया कि उन्होंने वर्ष १९९२ में साक को लांच किया। उन्होंने बताया कि इस कंपनी में हमने पहली बार मारुति ८०० के लिए लगेज ट्रे बनाई। उसके बाद तो अब पंजाब में सेकेंड डीसी के नाम से कंपनी को जाना जाता है।

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